Sunday, May 17, 2026

कंप्यूटर का परिचय (26-27)

कंप्यूटर का परिचय

“Computer” शब्द अंग्रेजी के “Compute” शब्द से बना है, जिसका अर्थ है गणना करना।विकास के प्रारम्भिक चरण में कंप्यूटरों का उपयोग मुख्यतः गणितीय गणनाएँ करने के लिए किया जाता था।

प्रारम्भ में गणितज्ञों और वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया, क्योंकि वे ऐसी मशीनें विकसित करना चाहते थे जो जटिल गणनाओं को तेज गति और शुद्धता के साथ हल कर सकें।

कंप्यूटर एक उन्नत इलेक्ट्रॉनिक मशीन है जिसे अंकगणितीय (Arithmetic) तथा तार्किक (Logical) क्रियाओं को तीव्र गति और शुद्धता के साथ स्वचालित रूप से करने के लिए प्रोग्राम किया जा सकता है।

परिभाषा :- कंप्यूटर एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है जो डाटा को इनपुट के रूप में ग्रहण करता है, उपयोगकर्ता द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुसार उसे संसाधित (Process) करता है, उसे संग्रहित करता है तथा परिणामस्वरूप उपयोगी जानकारी प्रदान करता है।

अथवा

कंप्यूटर एक उन्नत इलेक्ट्रॉनिक मशीन है जो इनपुट, प्रोसेस, आउटपुट तथा संग्रहण (IPOS) के सिद्धांत पर कार्य करते हुए विभिन्न कार्यों को तीव्र गति और शुद्धता के साथ सम्पन्न करती है।

कंप्यूटर के लाभ

1.       गति:- कंप्यूटर बहुत कम समय में अत्यधिक तेज गति से कार्य कर सकता है।

2.      संग्रहण क्षमता:- कंप्यूटर अपनी स्मृति में बहुत अधिक मात्रा में डाटा और जानकारी संग्रहित कर सकता है।

3.      शुद्धता:- कंप्यूटर कार्यों को अत्यधिक शुद्धता और सही परिणामों के साथ करता है।

4.      बहुउपयोगिता:- कंप्यूटर अनेक प्रकार के कार्य कुशलतापूर्वक कर सकता है।

5.      स्वचालन:- कंप्यूटर निर्देश और डाटा प्राप्त करने के बाद स्वतः कार्य कर सकता है।

6.      कार्य क्षमता:- कंप्यूटर बिना थके लंबे समय तक लगातार कार्य कर सकता है।

7.      विश्वसनीयता:- सही इनपुट दिए जाने पर कंप्यूटर विश्वसनीय और भरोसेमंद परिणाम प्रदान करता है।

8.      अनेक उपयोग:- कंप्यूटर का उपयोग आवश्यकता के अनुसार अनेक विभिन्न क्षेत्रों में किया जाता है।

कंप्यूटर की सीमाएँ

कंप्यूटर के लाभों के साथ-साथ इसकी कुछ सीमाएँ और कमियाँ भी हैं।

1.       भावनाओं का अभाव:- कंप्यूटर में मनुष्य की तरह भावनाएँ, संवेदनाएँ या सोचने की क्षमता नहीं होती है।

2.      निर्देशों पर निर्भरता:- कंप्यूटर केवल उपयोगकर्ता द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुसार कार्य करता है और स्वयं कार्य नहीं कर सकता।

3.      निर्णय लेने की क्षमता का अभाव:- कंप्यूटर स्वयं निर्णय नहीं ले सकता।

4.      सुरक्षा संबंधी जोखिम:- यदि उचित सुरक्षा न रखी जाए, तो कंप्यूटर वायरस, हैकिंग तथा साइबर हमलों से प्रभावित हो सकता है।

कंप्यूटर के उपयोग

वर्तमान समय में समाज के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में कंप्यूटर का उपयोग किया जा रहा है। कंप्यूटर के प्रमुख उपयोग क्षेत्र निम्नलिखित हैं।

1.       शिक्षा के क्षेत्र में

2.      चिकित्सा के क्षेत्र में

3.      सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में

4.      रेलवे तथा हवाई आरक्षण में

5.      बैंकिंग क्षेत्र में

6.      मौसम पूर्वानुमान में

7.      कार्टून तथा एनीमेशन फिल्म बनाने में

8.      विभिन्न प्रयोगशालाओं में

9.      यातायात नियंत्रण में

कंप्यूटर का इतिहास

कंप्यूटर का विकास अचानक नहीं हुआ, बल्कि विभिन्न गणना उपकरणों और मशीनों में लगातार सुधार के माध्यम से कई वर्षों में धीरे-धीरे हुआ। कंप्यूटर के विकास में अनेक वैज्ञानिकों, गणितज्ञों तथा आविष्कारकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। कई महत्वपूर्ण मशीनों ने आधुनिक कंप्यूटर के विकास में प्रमुख भूमिका निभाई।

अबेकस

अबेकस का विकास प्राचीन काल में हुआ और इसका उपयोग चीन, जापान तथा अन्य एशियाई देशों में गणितीय गणनाओं के लिए किया जाता था। इसे मानव द्वारा उपयोग किए गए प्रारम्भिक गणना उपकरणों में से एक माना जाता है।

अबेकस लकड़ी या धातु से बना एक आयताकार ढाँचा होता है जिसमें कई ऊर्ध्वाधर छड़ें और चलने वाले मनके लगे होते हैं। एक क्षैतिज विभाजक (Divider) इन छड़ों को दो भागों में बाँटता है। ऊपरी भाग को “Heaven” कहा जाता है जिसमें सामान्यतः दो मनके होते हैं, जबकि निचले भाग को “Earth” कहा जाता है जिसमें पाँच मनके होते हैं। छड़ों पर लगे मनकों को ऊपर-नीचे सरकाकर जोड़, घटाव, गुणा और भाग जैसी गणनाएँ की जाती थीं।

नेपियर बोन्स

1617 ईस्वी में स्कॉटलैंड के गणितज्ञ जॉन नेपियर ने गणनाओं को सरल बनाने के लिए नेपियर बोन्स का आविष्कार किया। यह हड्डी, लकड़ी या हाथी दाँत से बनी आयताकार पट्टियों का समूह था, जिन पर संख्याएँ लिखी होती थीं। इसका उपयोग मुख्यतः गुणा, भाग तथा लघुगणकीय गणनाओं के लिए किया जाता था। नेपियर के इस आविष्कार ने जटिल गणनाओं में लगने वाले समय को कम किया और यांत्रिक गणना उपकरणों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

स्लाइड रूल

1621 में अंग्रेज़ गणितज्ञ विलियम ऑट्रेड ने स्लाइड रूल का आविष्कार किया। इसे प्रारम्भिक एनालॉग गणना उपकरणों में से एक माना जाता है। स्लाइड रूल में दो अंकित पट्टियाँ होती थीं जो एक-दूसरे पर सरकती थीं और इनके माध्यम से गणनाएँ की जाती थीं। इसका उपयोग मुख्यतः गुणा, भाग, वर्गमूल, लघुगणक तथा त्रिकोणमितीय गणनाओं के लिए किया जाता था। इलेक्ट्रॉनिक कैलकुलेटर के आविष्कार से पहले वैज्ञानिक और इंजीनियर इसका व्यापक उपयोग करते थे।

एडिंग मशीन / पास्कलाइन

1642 में फ्रांस के गणितज्ञ ब्लेज़ पास्कल ने एडिंग मशीन का आविष्कार किया, जिसे पास्कलाइन भी कहा जाता है। यह पहली सफल यांत्रिक गणना मशीन थी जो अंकगणितीय क्रियाएँ स्वचालित रूप से कर सकती थी। इस मशीन में दाँतेदार पहिए और गियर लगे होते थे, जो आपस में जुड़े रहते थे। एक पहिए के घूमने पर दूसरा पहिया भी प्रभावित होता था। यह मशीन जोड़ और घटाव की गणनाएँ तेजी और शुद्धता से कर सकती थी। पास्कल ने यह मशीन अपने पिता की कर-गणनाओं में सहायता के लिए बनाई थी।

लीबनिज कैलकुलेटर

1672 में जर्मन गणितज्ञ और दार्शनिक गॉटफ्राइड विल्हेम लीबनिज ने पास्कल की मशीन में सुधार करके लीबनिज कैलकुलेटर का निर्माण किया। यह मशीन अधिक उन्नत थी क्योंकि यह जोड़, घटाव, गुणा और भाग सभी क्रियाएँ कर सकती थी। लीबनिज ने इसमें विशेष स्टेप्ड ड्रम प्रणाली का उपयोग किया जिससे गणनाएँ तेज और सरल हो गईं। इस आविष्कार ने यांत्रिक कैलकुलेटरों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भविष्य की कंप्यूटिंग मशीनों को प्रेरित किया।

मल्टिप्लाइंग मशीन

1820 में फ्रांसीसी इंजीनियर चार्ल्स ज़ेवियर थॉमस डी कोलमार ने मल्टिप्लाइंग मशीन का विकास किया, जिसे एरिथमोमीटर भी कहा जाता है। यह व्यावसायिक रूप से उपयोग की जाने वाली प्रारम्भिक सफल यांत्रिक गणना मशीनों में से एक थी। यह मशीन जोड़, घटाव, गुणा और भाग जैसी अंकगणितीय क्रियाएँ तेजी और शुद्धता से कर सकती थी। यह गियर, लीवर तथा घूमने वाले पहियों की सहायता से कार्य करती थी। एरिथमोमीटर कार्यालयों और व्यापारिक संस्थानों में बहुत लोकप्रिय हुआ क्योंकि इससे हाथ से की जाने वाली गणनाओं का कार्य कम हो गया और शुद्धता बढ़ गई।

जैकार्ड लूम

1801 में फ्रांसीसी आविष्कारक जोसेफ मेरी जैकार्ड ने जैकार्ड लूम का विकास किया, जो कपड़ों पर जटिल डिज़ाइन स्वचालित रूप से बनाने वाली उन्नत बुनाई मशीन थी। इस मशीन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता पंच कार्ड का उपयोग था, जिसके माध्यम से कपड़ों के डिज़ाइन नियंत्रित किए जाते थे। प्रत्येक पंच कार्ड में विशेष निर्देश होते थे, जिनके अनुसार मशीन डिज़ाइन तैयार करती थी। आगे चलकर पंच कार्ड में निर्देश संग्रहित करने की यही अवधारणा कंप्यूटर और डाटा संसाधन प्रणाली के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुई।

डिफरेंस इंजन

1822 में अंग्रेज़ गणितज्ञ चार्ल्स बैबेज ने डिफरेंस इंजन की रूपरेखा तैयार की, जो गणितीय सारणियों को स्वचालित रूप से तैयार करने के लिए बनाई गई एक यांत्रिक गणना मशीन थी। यह मशीन गियर, शाफ्ट और पहियों की सहायता से कार्य करती थी तथा इसका उद्देश्य मानवीय गणनाओं में होने वाली त्रुटियों को कम करना था। यह जटिल गणितीय गणनाएँ कर सकती थी और परिणामों को स्वचालित रूप से मुद्रित भी कर सकती थी। धन की कमी और तकनीकी कठिनाइयों के कारण यह मशीन पूरी तरह तैयार नहीं हो सकी, फिर भी यह आधुनिक कंप्यूटरों के विकास में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हुई।

एनालिटिकल इंजन

1833 में चार्ल्स बैबेज ने एनालिटिकल इंजन की रूपरेखा तैयार की, जिसे आधुनिक कंप्यूटर की पहली अवधारणा माना जाता है। यह मशीन अंकगणितीय गणनाएँ तथा तार्किक क्रियाएँ स्वचालित रूप से करने के लिए बनाई गई थी। इसमें आधुनिक कंप्यूटरों की तरह मेमोरी यूनिट, प्रोसेसर, इनपुट प्रणाली तथा आउटपुट प्रणाली जैसी इकाइयाँ थीं। एनालिटिकल इंजन में निर्देश और डाटा संग्रहित करने के लिए पंच कार्ड का उपयोग करने की योजना भी थी। इसी क्रांतिकारी डिजाइन के कारण चार्ल्स बैबेज को आधुनिक कंप्यूटर का जनककहा जाता है।

सेंसस टैबुलेटर

1890 में अमेरिकी आविष्कारक हरमन होलेरिथ ने जनगणना के आँकड़ों को तेज और शुद्ध तरीके से संसाधित करने के लिए सेंसस टैबुलेटर का आविष्कार किया। यह मशीन डाटा संसाधन के लिए पंच कार्ड और बिजली का उपयोग करती थी। यह बड़ी मात्रा में जानकारी को मैनुअल विधियों की तुलना में बहुत तेजी से क्रमबद्ध, गणना और रिकॉर्ड कर सकती थी। इस मशीन का सफल उपयोग अमेरिका की जनगणना में किया गया और इससे डाटा विश्लेषण में लगने वाला समय बहुत कम हो गया। बाद में होलेरिथ ने टैबुलेटिंग मशीन कंपनी की स्थापना की, जो आगे चलकर IBM बनी और विश्व की प्रमुख कंप्यूटर कंपनियों में शामिल हुई।

मार्क-1

1944 में हावर्ड ऐकेन और IBM के इंजीनियरों ने मार्क-1 कंप्यूटर का विकास किया, जिसे ऑटोमैटिक सीक्वेंस कंट्रोल्ड कैलकुलेटर (ASCC) भी कहा जाता है। यह विश्व का पहला बड़े स्तर का विद्युत-यांत्रिक कंप्यूटर था, जो गणनाएँ स्वचालित रूप से कर सकता था। इस मशीन में विद्युत और यांत्रिक दोनों प्रकार के भागों का उपयोग किया गया था तथा यह जटिल गणितीय समस्याओं को मनुष्यों की तुलना में बहुत तेज गति से हल कर सकती थी। मार्क-1 का उपयोग मुख्यतः द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वैज्ञानिक अनुसंधान और सैन्य गणनाओं के लिए किया गया। इसकी लंबाई लगभग 50 फीट थी और यह लंबे समय तक लगातार कार्य कर सकता था।

कंप्यूटर की पीढ़ियाँ

डिजिटल कंप्यूटरों के विकास को हार्डवेयर तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों तथा कार्य क्षमता के आधार पर पाँच पीढ़ियों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक नई पीढ़ी में पिछली पीढ़ी की तुलना में अधिक गति, संग्रहण क्षमता, विश्वसनीयता तथा उन्नत विशेषताएँ विकसित हुईं।

प्रथम पीढ़ी के कंप्यूटर:- प्रथम पीढ़ी के कंप्यूटरों में मुख्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के रूप में वैक्यूम ट्यूब का उपयोग किया जाता था। इस पीढ़ी का समय 1945 से 1955 तक माना जाता है। ये कंप्यूटर आकार में बहुत बड़े थे, अधिक बिजली की खपत करते थे तथा अत्यधिक गर्मी उत्पन्न करते थे। ENIAC, EDVAC, EDSAC और UNIVAC इस पीढ़ी के प्रमुख कंप्यूटर थे। प्रोग्रामिंग के लिए मुख्यतः मशीन भाषा तथा बाइनरी कोड का उपयोग किया जाता था।

प्रथम पीढ़ी के कंप्यूटरों की विशेषताएँ

1- इनमें मुख्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के रूप में वैक्यूम ट्यूब का उपयोग होता था।

2- ये आकार में बहुत बड़े होते थे।

3- ये बहुत अधिक बिजली की खपत करते थे।

4- कार्य करते समय इनमें अत्यधिक गर्मी उत्पन्न होती थी।

5- इनकी गति अपेक्षाकृत कम थी।

6- प्रोग्रामिंग के लिए मशीन भाषा और बाइनरी भाषा का उपयोग किया जाता था।

7- ये कम विश्वसनीय थे और बार-बार रखरखाव की आवश्यकता होती थी।

द्वितीय पीढ़ी के कंप्यूटर:-  द्वितीय पीढ़ी के कंप्यूटरों में वैक्यूम ट्यूब के स्थान पर ट्रांजिस्टर का उपयोग किया गया। इस पीढ़ी का समय 1956 से 1963 तक माना जाता है। ट्रांजिस्टर आकार में छोटे, तेज, अधिक विश्वसनीय तथा कम बिजली की खपत करने वाले थे। इस सुधार के कारण द्वितीय पीढ़ी के कंप्यूटर आकार में छोटे और अधिक कार्यक्षम बन गए। इस पीढ़ी में FORTRAN, COBOL तथा ALGOL जैसी उच्च स्तरीय प्रोग्रामिंग भाषाओं का विकास हुआ।

द्वितीय पीढ़ी के कंप्यूटरों की विशेषताएँ

1- इनमें वैक्यूम ट्यूब के स्थान पर ट्रांजिस्टर का उपयोग किया गया।

2- ये आकार में छोटे थे।

3- ये कम बिजली की खपत करते थे और कम गर्मी उत्पन्न करते थे।

4- इनकी गति और संग्रहण क्षमता बढ़ गई।

5- ये प्रथम पीढ़ी के कंप्यूटरों की तुलना में अधिक विश्वसनीय थे।

6- इनमें FORTRAN, COBOL तथा ALGOL जैसी उच्च स्तरीय भाषाओं का उपयोग किया गया।

तृतीय पीढ़ी के कंप्यूटर:- तृतीय पीढ़ी के कंप्यूटरों में ट्रांजिस्टर के स्थान पर इंटीग्रेटेड सर्किट (IC) का उपयोग किया गया। इस पीढ़ी का समय 1964 से 1971 तक माना जाता है। इंटीग्रेटेड सर्किट के कारण कंप्यूटर छोटे, तेज, सस्ते और अधिक विश्वसनीय बन गए। इसी पीढ़ी में ऑपरेटिंग सिस्टम तथा मल्टीप्रोग्रामिंग की अवधारणाओं का विकास हुआ। कंप्यूटरों में कीबोर्ड, मॉनिटर तथा अन्य इनपुट-आउटपुट उपकरणों का उपयोग सामान्य हो गया।

तृतीय पीढ़ी के कंप्यूटरों की विशेषताएँ

1- इनमें इंटीग्रेटेड सर्किट (IC) का उपयोग किया गया।

2- ये छोटे और अधिक विश्वसनीय थे।

3- इनकी गति और संग्रहण क्षमता में काफी वृद्धि हुई।

4- इनमें कीबोर्ड और मॉनिटर का उपयोग होने लगा।

5- इस पीढ़ी में ऑपरेटिंग सिस्टम का विकास हुआ।

6- इनमें BASIC तथा अन्य आधुनिक प्रोग्रामिंग भाषाओं का उपयोग किया गया।

7- ये पिछली पीढ़ियों की तुलना में सस्ते थे।

चतुर्थ पीढ़ी के कंप्यूटर:- चतुर्थ पीढ़ी के कंप्यूटर माइक्रोप्रोसेसर तकनीक पर आधारित हैं। इस पीढ़ी में LSI (Large Scale Integration) तथा VLSI (Very Large Scale Integration) तकनीक का उपयोग किया गया। इस पीढ़ी की शुरुआत लगभग 1971 में हुई और इसी से पर्सनल कंप्यूटर (PC) का विकास हुआ। कंप्यूटर बहुत छोटे, तेज, विश्वसनीय और सस्ते हो गए। माउस, प्रिंटर, स्कैनर तथा ग्राफिकल यूज़र इंटरफेस जैसे आधुनिक इनपुट-आउटपुट उपकरणों का व्यापक उपयोग होने लगा।

चतुर्थ पीढ़ी के कंप्यूटरों की विशेषताएँ

1- इनमें माइक्रोप्रोसेसर तकनीक का उपयोग किया गया।

2- इनमें LSI तथा VLSI तकनीक का उपयोग हुआ।

3- कंप्यूटर बहुत छोटे और पोर्टेबल हो गए।

4- इनकी गति और संग्रहण क्षमता बहुत अधिक बढ़ गई।

5- इनमें आधुनिक प्रोग्रामिंग भाषाओं का उपयोग किया गया।

6- माउस, प्रिंटर, स्कैनर तथा GUI तकनीक का उपयोग सामान्य हो गया।

7- इसी पीढ़ी में पर्सनल कंप्यूटर लोकप्रिय हुए।

पंचम पीढ़ी के कंप्यूटर:- पंचम पीढ़ी के कंप्यूटर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मशीन लर्निंग तथा उन्नत सेमीकंडक्टर तकनीक पर आधारित हैं। इस पीढ़ी की शुरुआत लगभग 1985 से मानी जाती है और यह वर्तमान समय तक जारी है। वैज्ञानिक ऐसे बुद्धिमान कंप्यूटर विकसित कर रहे हैं जो प्राकृतिक भाषा को समझ सकें, आवाज पहचान सकें, निर्णय ले सकें तथा जटिल समस्याओं को स्वचालित रूप से हल कर सकें। रोबोटिक्स, एक्सपर्ट सिस्टम, क्लाउड कंप्यूटिंग तथा AI आधारित अनुप्रयोग पंचम पीढ़ी के कंप्यूटरों के उदाहरण हैं।

पंचम पीढ़ी के कंप्यूटरों की विशेषताएँ

1- इनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तकनीक का उपयोग किया जाता है।

2- ये अत्यंत तेज और शक्तिशाली होते हैं।

3- ये बहुत अधिक डाटा को तेजी से संसाधित कर सकते हैं।

4- इनमें प्राकृतिक भाषा संसाधन तथा वाणी पहचान संभव है।

5- इनमें रोबोटिक्स तथा मशीन लर्निंग तकनीकों का उपयोग किया जाता है।

6- ये बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय लेने में सक्षम हैं।

7- कंप्यूटरों के व्यापक उपयोग के कारण वर्तमान युग को डिजिटल युग कहा जाता है।

 

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